जीवन का उद्देश्य — पहली हिमालय यात्रा - A path to self-realization

 

बहुत दिनों से मन में कई प्रश्न उठते रहते थे—हम धरती पर क्यों हैं, हम कौन हैं, जीवन का उद्देश्य क्या है, धर्म क्या है? जब सत्य एक है, तो इतने धर्म क्यों हैं? मनुष्यों में एक-दूसरे के प्रति इतनी ईर्ष्या और घृणा क्यों है? हिंदू धर्म में भी इतने अलग-अलग मत क्यों हैं?


अपने व्यक्तिगत जीवन में बचपन से संघर्ष और अभावों के बावजूद, हमें जीवन में बहुत कुछ प्राप्त हुआ—जो शायद बहुत से लोगों के लिए सपनों जैसा हो: एक अच्छी नौकरी, अच्छी कॉर्पोरेट सैलरी, अच्छा परिवार, देश-विदेश की यात्राएँ, स्वस्थ जीवन, खेलकूद, संगीत, और साथ ही अपने गाँव-देश के सामाजिक उत्थान के लिए कार्य।


इतना सब कुछ होने के बाद भी, मन के भीतर कहीं न कहीं एक अशांति हमेशा बनी रहती थी, क्योंकि कुछ ऐसे प्रश्न थे जिनके उत्तर हमारे पास नहीं थे।


कई महीनों पहले विचार आया कि जीवन के 50 वर्ष पूर्ण होने वाले हैं। क्यों न स्वयं को समझने और आत्म-अनुभूति (self retreat) के लिए कुछ समय निकाला जाए, और एकांत में हिमालय की यात्रा की जाए।




हम अपने आपको सौभाग्यशाली मानते हैं कि 1 अप्रैल से 11 अप्रैल तक हमें उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में रहने का अवसर मिला। कुछ दिन चम्पावत जिले में स्वामी विवेकानंद के स्वप्न-स्थल अद्वैत आश्रम, मायावती में; कुछ दिन अल्मोड़ा के रामकृष्ण कुटीर आश्रम में; और कुछ दिन बिनसर घाटी में बिताने का अवसर मिला।


इन 11 दिनों में हमें अपने अनसुलझे प्रश्नों पर गहराई से विचार करने का समय मिला। ऐसा लगा मानो अज्ञानता की परतें एक-एक करके हटने लगी हों। यह कहना मूर्खता होगी कि हमें पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया है, पर इतना अवश्य हुआ कि जीवन का एक उद्देश्य स्पष्ट होने लगा है।


अब शेष जीवन में, अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक दायित्वों के साथ-साथ, सामाजिक दायित्वों को भी निःस्वार्थ भाव से निभाने का संकल्प है—ताकि सच्चे अर्थों में मानव सेवा की जा सके।


स्वामी विवेकानंद के जीवन से एक बात गहराई से समझ में आई—मानवता ही सच्चा धर्म है, और सभी जीवों में शिव हैं।


तत् त्वम् असि — That Thou Art 



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